छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ी जंगलों के इस फल को शहरों के GEN-Z कम ही जानते हैं… मीठे-अनोखे कसैलेपन वाले इस फल की अभी वनांचल में बहार

छत्तीसगढ़ में इस वक्त जंगल से निकलने वाले एक ऐसे फल का मौसम है, जो जिसकी वनांचल में तो अब भी बहार है, लेकिन रायपुर समेत शहरों में बमुश्किल नजर आ रहा है। यह है पीला-नारंगी तेंदू फल, जो अप्रैल अंत से जून के पहले हफ्ते तक पूरे छत्तीसगढ़ में नजर सिर्फ नजर आता था, बल्कि अपने मीठे और अनोखा कसैलापन लिए हुए स्वाद की वजह से खाया भी जाता था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने तक रायपुर समेत शहरों में अप्रैल अंत से जून के पहले हफ्ते तक तेंदू मिलता और बिकता भी था। समूचे बस्तर के अलावा रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और सरगुजा संभाग के जंगलों से निकलकर तेंदू गांवों-कस्बों में तो काफी नजर आ रहा है, लेकिन रायपुर, दुर्ग-भिलाई और बिलासपुर समेत प्रमुख शहरों में नई जनरेशन ने शायद इसे देखा नहीं या खाया नहीं। छत्तीसगढ़ के इस फल की हत्या चीप और लो मार्केट जैसे शब्दों ने कर दी, इसलिए शहर में तेंदू मिले न मिले, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता।

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छत्तीसगढ़ के वनांचल में पाया जाने वाला तेंदू फल (Diospyros melanoxylon) न केवल स्वाद में अनोखा है, बल्कि स्वास्थ्य और जनजातीय आजीविका के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह फल पकने के बाद गहरा पीला या नारंगी रंग का हो जाता है। इसका स्वाद मीठा होता है, जिसमें हल्का कसैलापन (Astringent) भी महसूस होता है। यह मुख्य रूप से गर्मी के मौसम (मार्च से मई) में पकता है और साल में केवल 2 महीने ही उपलब्ध रहता है। छत्तीसगढ़ में यह विशेष रूप से कोंडागांव, कांकेर, बस्तर, और सरगुजा के वनांचलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह चीकू टाइप ही नजर आता है, लेकिन छिलका काफी मोटा रहता है। छिलका हटाने के बाद भीतर बीज वगैरह और टेक्सचर चीकू जैसा ही है, टेस्ट जरा अलग है।

गर्मी में हाईड्रेशन, हाई फाइब्रस फल

द फार्मा इनोवेशन जनरल के मुताबिक तेंदू फल विटामिन ए, सी, फाइबर और खनिजों का एक बेहतरीन स्रोत है। हाई फाइबर सामग्री के कारण यह पाचन में सुधार करता है, कब्ज दूर करता है और आंतों के लिए फायदेमंद रहता है। गर्मियों में इसके सेवन से शरीर को प्राकृतिक ठंडक मिलती है और यह डिहाइड्रेशन व थकान से राहत दिलाता है।

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