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छत्तीसगढ़ नक़ली वनभैंसा स्कैम… वन अफसर जिन्हें 20 साल से असली नस्ल का बताकर करोड़ों रुपए फूंकते रहे, अब उन्हें हाइब्रिड कहकर उदंती से निकाला…

दो दशक पहले जब छत्तीसगढ़ से लोकल वनभैंसे की नस्ल खत्म होने पर आ गई, तब यहाँ के तत्कालीन वन अफसरों ने आशा नाम की भैंस को सामने रखकर बड़ा खेल रचा। वन अफसरों ने कुछ बड़े प्रचार समूहों से साँठगाँठ की और सबसे पहले यह स्थापित किया कि आशा ही असली वनभैंस है। उसके डीएनए से नस्ल बचाने जा रहे हैं। इसके बाद लाखों रुपए खर्च करके एक भैंस शावक को वन अफसरों ने असली वनभैंस की नस्ल बताकर छत्तीसगढ़ के लोगों के सामने पेश कर दिया। जैसे-जैसे समय बीतता गया, असली वनभैंसों का कुनबा बढ़ता गया। लेकिन कुछ अरसा पहले केंद्र से ही इसका भांडा फूट गया। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने इन वन भैसों को हाइब्रिड बताकर असम के प्योर ब्रीड वन भैंसों के साथ प्रजनन के लिए स्वीकृति देने से इनकार कर दिया। इस तरह, यह स्थापित हो गया कि जिन्हें असली बताकर वन अफ़सर हर साल लाखों रुपए फूंकते रहे, वह सभी हाइब्रिड यानी एक तरह से नक़ली ही हैं। तमाम उठापटक के बाद आख़िरकार दस दिन पहले सभी हाइब्रिड वनभैंसों को उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व से बाहर 100 किलो मीटर दूर छोड़ दिया गया है।जानकार बता रहे हैं किसभी वनभैंसों को ओडिशा में छोड़ा गया है, ताकि वापस नहीं आ पाएं।

यह मामला रायपुर के वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने उठाया है ल। वन विभाग की ओर से अधिकृत जवाब नहीं आया, लेकिन सारे वनभैंसों को चुपचाप उदंती से निकाल बाहर करके वन विभाग ने बड़े गोलमाल को एक तरह से स्वीकार तो कर ही लिया है। वन्यजीव प्रेमी की ओर से वन अफसरों को लिखी चिट्ठी में जांच की मांग करते हुए बताया गया की 2007 में एक ग्रामीण से वन अफसर जबरदस्ती आशा नामक मादा को ले कर आए और इसे शुद्ध नस्ल का बताया गया। आशा ने राजा, प्रिंस, मोहन, वीरा, सोमू, खुशी और हीरा को जन्म दिया। बाद में विभाग ने ग्रामीणों से रंभा और मेनका नाम की दो क्रॉस मादा खरीदी। रंभा और मेनका ने मालती और भानुमति को जन्म दिया। चारों ने पार्वती, विष्णु, दुर्गा, किरण, कान्हा, प्रह्लाद, रवि, सोमवती, जानकी, उर्वशी और सूर्या (15 से ज्यादा) को जन्म दिया।

सभी हाइब्रिड वन भैंसे

वन विभाग को पहले दिन से ही पता था कि आशा सहित ये सभी हाइब्रिड वन भैंसे हैं। रंभा और मेनका की खरीदी के कागज़ में ही लिखा है कि दोनों क्रॉस ब्रीड हैं। करीब 17 साल बाद जब केंद्रीय जू अथारिटी ने इन्हें असली मानने से इंकार करते हुए हाइब्रिड करार दिया, तब घबराए वन अफसरों ने अचानक अनुच्छेद 48(ए) और 51(ए)(जी) के प्रावधानों के हवाले से उप निदेशक यूएसटीआर ने सभी हाइब्रिड वन भैंसों को छोड़ने का प्रस्ताव रखा। बाद में अक्टूबर 2023 में इन्हें बाड़े से भगा दिया. मगर बताया गया कि बाड़ा तोड़कर सभी भाग गए। उधर, यूएसटीआर में बड़ी संख्या में गांव होने के कारण इन हाइब्रिड वनभैंसों ने कुछ नुकसान पहुंचाया। ग्रामीणों ने मुआवज़े की मांग की, लेकिन वन विभाग ने हाइब्रिड वन जानवरों के कारण होने वाले फसल नुकसान की भरपाई के लिए प्रावधानों की कमी का हवाला देते हुए इनकार कर दिया। नतीजा यह निकला कि अगस्त 2024 में, लाठी-डंडे की मदद से ग्रामीणों ने हाइब्रिड वन भैंसों को पुराने बाडे में रख दिया। बाद में फसल के समय ये बाड़े में रहते थे, बाकी समय जंगल में।

2.47 करोड खर्च

वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक वन विभाग ने इन पर भोजन और पूरक आहार, बाड़े का रख-रखाव और कई मदों पर 2,46,38,831.00 रुपए खर्च किए। अब वन विभाग पिछले छ: साल से बारनवापारा में बाड़े में कैद तीन मादा वन भैसों को उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व में एक मात्र बचे 26 वर्ष के “छोटू” वन भैंसे से, जिसे बुढ़ापे के कारण बिलकुल कम दिखता है उससे क्रॉस कराने लाने की तैयारी कर रहा है। बारनवापारा से लाने के 45 दिनों बाद इन्हें छोटू के साथ जंगल में छोड़ दिया जाएगा। ऐसे में अगर हाइब्रिड वन भैंसे भी उदंती-सीता नदी के जंगल में रहते, तो असम की प्योर ब्रीड मादा से इन हाइब्रिड नर वन भैंसों की मैटिंग की सम्भावना रहती। इसलिए इन्हें वन विभाग ने उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व के इलाके के बाहर छोड़ दिया है।

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