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पैरों तले सड़क ही खिसक गई… मुद्दा ये नहीं कि यह छत्तीसगढ़ में कहां की है… बल्कि जहां-जहां भी हैं, तुरंत ठीक होनी चाहिए

दो गांवों को जोड़ने वाली 1.33 किमी की इस सड़क पर नज़र डालते हैं। ये रास्ता “नज़र हटी दुर्घटना घटी” वाले नारे का सटीक उदाहरण है। हवाई झूले में हाथ उधर-हुआ तो चारों खाने चित्त… इस रास्ते पर एक पैर इधर-हुआ तो फिसलकर चित्त। जहां पैदल नहीं चल सकते, क्या उसे सड़क कह सकते हैं? शायद नहीं, लेकिन वहाँ लगा सरकारी बोर्ड इसे सड़क बता रहा है। पीएमजीएसवाई सड़क… लंबाई 1.33 किमी… लागत 95 लाख रुपए।

मामला सिर्फ पीएम सड़कों का नहीं है। एनएच से लेकर हर एजेंसी के दामन पर ऐसी सड़कों से उछला कीचड़ लगा है। यकीन करिए कि ऐसी सड़क देखकर जितना बुरा हम-आपको लग रहा है, शायद नेताओं-अफसरों को भी लगता होगा या लगना चाहिए। खैर, यह राजनैतिक विश्लेषण का विषय नहीं, बल्कि आम आदमी की बुनियादी सुविधा पर आघात का मसला है। बात इतनी सी है कि बारिश में सरकारी अमले को झोंककर यह पता लगाना मुश्किल नहीं कि कहां-कहां लोगों के पैरों के नीचे से सड़क खिसक गई है। ऐसी सड़कों को जल्दी ठीक करवाएं तो बड़ी मेहरबानी…।

अंत में, तस्वीर में नज़र आ रहे बोर्ड को ज़ूम करने पर सड़क का ब्योरा मिल जाएगा।

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