झड़ी का दूसरा दिन… ज्यादातर नदी-नाले चढ़े, तेज बहाव में इन्हें पार करना खतरनाक… पर सवाल यही है- कौन और कैसे रोके..?
मानसून मंगलवार से लगभग पूरे छत्तीसगढ़ में सक्रिय हो गया है। आषाढ़ की पहली झड़ी (लगातार बारिश) झाड़ी चल रही है, जिसका आज दूसरा दिन है। मंगलवार को सुबह से बुधवार को लगभग शाम तक सूरज नज़र नहीं आया है। छत्तीसगढ़ में 40 साल या ऊपर वाले हर व्यक्ति को याद है कि प्रदेश में झड़ी सात से दस दिन तक चलती थी और सूरज नहीं दिखता था। पिछले दो दशक से झड़ी का समय घटकर चार-पाँच या कम रह गया है। इस झड़ी के भी गुरुवार या अधिकतम शुक्रवार तक खुलने का मौसम वैज्ञानिकों का पूर्वानुमान है, यानी दो-तीन दिन।
बहरहाल, इस झड़ी ने प्रदेश को बहुत अच्छी तरह भिगोया है। आज सुबह से ऐसे तमाम नदी-नालों का पानी चढ़ गया है, जहां पुल कम ऊंचाई के हैं। ग्रामीण अंचल की हर कनेक्टिंग रोड पर कोई न कोई नाला पुल के ऊपर बह रहा है। एक से दो फुट तक पानी चल रहा है और लोग इन्हें बाइक से पैदल ही अंदाज़े से पार कर रहे हैं। लोग जानते हैं कि ऐसा करना खतरे से ख़ाली नहीं, पर वो रुकते नहीं है। प्रशासन-पुलिस को भी पता है कि यह जानलेवा है, लेकिन हर पुल या रपटे पर सरकारी आदमी दिन-रात तैनात नहीं हो सकता, जो लोगों को ऐसा करने से रोके। ऐसे में लोगों को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए, इस प्रवृत्ति को कौन रोके और किस तरह रोके, इस सवाल का पुख्ता जवाब अब तक तो शायद किसी के पास नहीं है।



