पहली बार : जंगल की इमली, आम, बाजरा और मोटे अनाज बचाने की बड़ी कोशिश… दंतेवाड़ा में साय सरकार बना रही है 25 करोड़ रुपए का कोल्ड स्टोरेज

छत्तीसगढ़, खासकर बस्तर इमली, देशी आम, बाजरा और मोटे अनाज के मामले में पूरे देश में विख्यात है। ये वनोपज जंगल में ख़ुद उगती हैं और इनका उत्पादन भी भारी है। पर सबसे बड़ी दिक्कत इन्हें संभालकर रखने की है। ऐसी सुविधा नहीं होने के कारण ये प्रोडक्ट 20 फीसदी तक बर्बाद हो रहे हैं। इन्हें बचाने के लिए सीएम विष्णुदेव साय की सरकार बड़ी योजना लेकर आई है। सरकार के निर्देश पर इन्ही फसलो के लिए दंतेवाड़ा में पहली बार 25 करोड़ रुपए की लागत से कोल्ड स्टोरेज का काम शुरू होने जा रहा है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार इस परियोजना की लागत करीब 25 करोड़ रुपये है और इसे जिला परियोजना आजीविका कॉलेज सोसायटी चला रही है। यह संस्था खासतौर पर आदिवासी इलाकों में रोजगार बढ़ाने के लिए बनी है। पातररास गांव में बनने वाली इस परियोजना में 1500 टन की क्षमता वाला कोल्ड स्टोरेज, 1000 टन का फ्रोजन स्टोरेज, 5 छोटे-छोटे कोल्ड रूम,फलों को जल्दी ठंडा करने के लिए ब्लास्ट फ्रीजर,पकने वाली चीजों के लिए अलग चौंबर,रेडिएशन मशीन जिससे चीजें लंबे समय तक खराब न हों, सामान ले जाने वाले 3 बड़े ट्रक तथा बिजली बचाने के लिए 70 किलोवॉट का सोलर सिस्टम लगेगा। यह सुविधा हर साल 10 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा उपज को सुरक्षित रखने में मददगार साबित होगी और इसका फायदा दंतेवाड़ा के अलावा बस्तर, बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव और नारायणपुर जैसे जिलों के किसानों और वनोपज संग्राहकों को मिलेगा। इस परियोजना के लिए 10 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की योजना से तथा 14.98 करोड़ रुपये जिला खनिज निधि (डीएमएफ) से व्यय किये जायेंगे।
बस्तर क्षेत्र में इमली, महुआ, जंगली आम, देशी मसाले और मोटे अनाज जैसे बाजरा जैसी उपज होती है। लेकिन सही तरीके से उन्हें संरक्षित रखने और बेचने की सुविधा नहीं होने से हर साल 7 से 20 प्रतिशत उपज खराब हो जाती है। अब जो सुविधा बन रही है, उसमें कोल्ड स्टोरेज, फ्रीजर, रेडिएशन मशीन, और सामान ढोने के लिए बड़े ट्रक होंगे। इससे ये चीजें लम्बे समय तक सुरक्षित रखी जा सकेंगी। उत्पादों का टिकाऊपन बढ़ेगा, बर्बादी रुकेगी और किसानों को ज्यादा दाम मिलेंगे।
यह परियोजना इस बात का प्रमाण है कि अगर नीति, सरकारी संसाधन और लोगों की मेहनत साथ आ जाएं, तो गांव की अर्थव्यवस्था भी चमक सकती है। यह मॉडल अब दूसरे आदिवासी इलाकों के लिए भी एक उदाहरण बनेगा, जहां जनजातीय समुदायों को उनका हक और सम्मान दोनों मिल सके। यह परियोजना बस्तर की तस्वीर को नया आयाम देगी।



