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खुलेआम तो मत काटने दीजिए : जंगलों के भीतर का पता नहीं, सड़क किनारे ही ऐसे दृश्य… गार्ड से पीसीसीएफ तक सब चुप

सड़क किनारे के जंगल काटने की जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह कवर्धा के तारेगांव जंगल में सोमवार की शाम स्थानीय स्तर पर ली गई है। जो पेड़ काट रहे हैं, वे माफिया नहीं, मज़दूर हैं। दो-चार की रोज़ी में 60-70 फीट ऊँचे पेड़ों को मिनटों में धराशायी कर देते हैं। इन्हें बस यही बताया जाता है कि अपना काम करो, ये चुपचाप वही करते हैं। हालांकि फारेस्ट गार्ड से लेकर पीसीसीएफ तक, वन विभाग में सबको बताया जाता है कि खामोशी से अपना काम करना है। इन तस्वीरों को देखकर लगता है कि वे भी खामोशी से ही काम कर रहे हैं।

आमतौर पर जर्नलिज्म में सिखाया जाता है कि हर घटना में आधिकारिक वर्शन लेना सही है। इन तस्वीरों को दिखाकर आप डीएफओ दस्फ़्तर से अरण्य भवन तक किसी भी अफ़सर से बयान लें, वह एक जैसा ही रहेगा- अरे, ये कहां का है… तुरंत दिखवाता हूं। तो अगर इस तरह के प्रत्यक्ष और पुख़्ता प्रमाण हैं, तब स्टोरी चलने दीजिए,वर्शन ख़ुद आ जाएगा।

हाँ, ग्रामीण क्षेत्रों में नेक्स्ट लेवल की पत्रकारिता हो रही है। स्थानीय पत्रकार ऐसी तस्वीरें और वीडियो ले आते हैं, जो असंभव सी लगती हैं। ये मेहनत और हौसला बने रहना चाहिए।

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