छत्तीसगढ़

रावघाट रेललाइन 1914 में बनना शुरू हुई, और आज चली पहली ट्रेन… बस्तर का यह दुर्गम इलाका सीधे रायपुर से कनेक्ट

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छत्तीसगढ़ के रेल इतिहास में आज मंगलवार, 20 अक्टूबर को एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। आजादी के बाद पहली बार बस्तर के दुर्गम क्षेत्र रावघाट तक पैसेंजर ट्रेन शुरू हो गई है। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से ताड़ोकी-रावघाट नई रेल लाइन का लोकार्पण किया। आज से शुरू हुई पैसेंजर ट्रेन रायपुर से दोपहर 1:20 बजे छूटेगी। दोपहर 2:30 बजे दुर्ग पहुंचेगी और वहां से 2:40 बजे छूटकर शाम 7:00 बजे रावघाट पहुंचेगी। यही ट्रेन रावघाट से चलकर सुबह 11:40 बजे रायपुर आएगी। रायपुर रेलवे स्टेशन परिसर में हुए मुख्य समारोह में छत्तीसगढ़ के सीएम विष्णुदेव साय उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल, पूर्व मंत्री राजेश मूणत समेत कई विधायक और जनप्रतिनिधि मौजूद थे।

पहले से चल रही ताड़ोकी-रायपुर पैसेंजर ट्रेन सेवा का विस्तार अब सीधे रावघाट तक कर दिया गया है। उद्घाटन के दिन ट्रेन की कमान महिला लोको पायलट प्रतिभा बंसोड़ ने संभाली। रावघाट में रेल लाइन बिछाने के लिए पहला सर्वे अंग्रेजों के शासनकाल में साल 1914 में किया गया था। इस परियोजना को पूरा होने में एक सदी से भी अधिक का समय लग गया। दल्लीराजहरा से रावघाट के बीच करीब 1,628 करोड़ रुपये की लागत से 95 किलोमीटर लंबी नई रेल लाइन का कार्य पूर्ण किया गया है। इसमें हाल ही में ताड़ोकी से रावघाट के बीच का 17.5 किमी का अंतिम खंड भी शामिल है। यह ट्रैक घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र से गुजरता है। निर्माण के दौरान नक्सली खतरों को देखते हुए हर 5 किलोमीटर पर सुरक्षा कैंप बनाए गए थे और रोजाना केवल 5 से 6 घंटे ही काम हो पाता था।

रायपुर में सीएम विष्णुदेव साय की उपस्थिति में हुए इसी कार्यक्रम के दौरान अभनपुर-कुरूद ब्रॉडगेज लाइन और रायपुर-कुरूद नई यात्री ट्रेन (मेमू) सेवा का भी शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर सीएम साय ने कहा, “रावघाट तक रेल की सीटी गूंजना केवल एक नई यात्रा की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह बस्तर अंचल में विकास, जनता के विश्वास और नई संभावनाओं के एक नए युग का प्रारंभ है। उन्होंने इसे दक्षिण छत्तीसगढ़ की विकास यात्रा में एक नया ऐतिहासिक अध्याय बताया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि रावघाट तक रेल की पटरी पहुंचना केवल रेल कनेक्टिविटी का विस्तार भर नहीं है, बल्कि यह दूरस्थ और आदिवासी अंचलों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।

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