छत्तीसगढ़

सिरपुर यूनेस्को की अस्थायी लिस्ट में शामिल… अब यह विश्व धरोहर होने के बिल्कुल करीब

छत्तीसगढ़ में महानदी के तट पर बसी प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर को यूनेस्को की अस्थायी सूचि में शामिल कर लिया गया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद अब सिरपुर विश्व धरोहर (world heritage) बनने के बिल्कुल करीब पहुंच गया है।सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर, बौद्ध विहार, सुरंग टीला और अद्भुत स्थापत्य कला के साथ लगभग डेढ़ हजार वर्षों के गौरवशाली इतिहास को अब दुनिया रिकोग्नाइज़ कर रही है।

महासमुंद जिले में पुण्य सलिला महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगरी सिरपुर को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Tentative List) में शामिल किया गया है। यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तिकला, स्थापत्य वैभव और धार्मिक सहिष्णुता की अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध सिरपुर अब विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और उन्हें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। सिरपुर का यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना इसी दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से विख्यात यह नगर पाण्डुवंशी शासकों के शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के तट पर स्थित यह नगर राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। सिरपुर की प्राचीनता के महत्वपूर्ण प्रमाण शरभपुरीय शासकों प्रवरराज और महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से प्राप्त होते हैं। पाण्डुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के लगभग 57 वर्षों के दीर्घ शासनकाल में सिरपुर ने सांस्कृतिक और स्थापत्य विकास की नई ऊंचाइयों को प्राप्त किया। इस काल में अनेक मंदिरों, बौद्ध विहारों, सरोवरों तथा उद्यानों का निर्माण हुआ।

सातवीं शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की थी। उनके यात्रा विवरणों में यहां बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है। उस काल में इस क्षेत्र में लगभग 100 बौद्ध संघाराम तथा महायान परंपरा के लगभग 10 हजार भिक्षुओं की उपस्थिति का वर्णन मिलता है।

सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषता यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धार्मिक परंपराओं का सहअस्तित्व है। स्वयं शैव मत के अनुयायी होने के बावजूद महाशिवगुप्त बालार्जुन ने बौद्ध विहारों को उदारतापूर्वक दान देकर संरक्षण प्रदान किया। यह तथ्य सिरपुर को प्राचीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करता है।

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