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INNOVATION – जर्मनी से 1965 में लाई मशीन 20 साल से खराब थी… तकनीक आउडेटेड, पर बिजली कंपनी वालों ने बना दी… चेयरमैन सुबोध सिंह ने सराहा

छत्तीसगढ़ में बिजली कंपनी के तकनीशियनों ने जर्मनी से 1965 में आयात की गई ऐसी रेडियल ड्रिल मशीन को यहीं दो साल में बना दिया, जिसे आउटडेटेड टेकनालाजी के कारण जर्मन इंजीनियर भी नहीं बना रहे थे। 60 एमएम एंगल को एक साथ 180 डिग्री में घूमकर दो तरफ से होल करने वाली यह खास और उस वक्त की काफी महंगी मशीन मध्यप्रदेश के जमाने में जर्मनी से मंगवाई गई थी। राज्य बनने के बाद यह छत्तीसगढ़ के हिस्से में आई और बेहद उपयोगी थी। लेकिन 2005 के आसपास मशीन बिगड़ गई। नहीं बनने की वजह से इसे भिलाई में डंप कर दिया गया। लेकिन दो साल पहले बिजली कंपनी के तकनीशियनों ने इसे सुधारने का बीड़ा उठाया। मशीन को पूरी तरह खोलकर और उसकी टेकनालाजी समझने के बाद जरूरी उपकरण बनाकर फिट किए गए। धीरे-धीरे सुधारते हुए इसे हाल में चालू कर दिया गया। यह नवाचार का बड़ा उदाहरण था, इसलिए बिजली कंपनी के चेयरमैन सुबोध कुमार सिंह ने असंभव जैसे इस काम को संभव करने वाले बिजली कंपनी के तकनीशियनों की सराहना की है। आप यकीन करेंगे कि यह मशीन जो काम करती है, उसके लिए बिजली कंपनी को पिछले दो दशक से काफी पैसे खर्च करने पड़ रहे थे, जो अब बचेंगे। स्टेट पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी के एमडी राजेश कुमार शुक्ला ने कहा कि आऊटसोर्सिंग को बढ़ावा देने के युग में इनहाउस टैलेंट पर विश्वास करना एक अच्छी पहल है।

इन लोगों ने मिलकर बनाया इस मशीन को

जर्मनी की इस मशीन की मरम्मत ईई बरखा दुबे, एई आकाश सिन्हा तथा तकनीकी कर्मचारियों शाहजहां शाह और टी सिम्हाचलम् तथा टीम ने की। इस रेडियल ड्रिल मशीन का फायदा यह है कि यह 16 एमएम मोटाई के लोहे के एंगल को दो दिशा (2-डी) में एक साथ छेद कर सकता है। यह 180 डिग्री में घूमकर काम करता है, जिससे काम जल्दी पूरा हो सकेगा। कार्यपालक निदेशक (ट्रांसमिशन) वीके दीक्षित ने बताया कि रेडियल ड्रिल मशीन के पुनः चालू होने से अब अति उच्च दाब ट्रांसमिशन टावरों के निर्माण में प्रयुक्त मोटे स्टील एंगल, प्लेट एवं भारी संरचनात्मक सामग्री में सटीक और तीव्र ड्रिलिंग संभव हो सकेगी। इससे जहां काम की गति बढ़ेगी, वहीं अब यह कार्य कम कर्मचारियों में ही पूरा किया जा सकेगा, जिससे मानव संसाधन की दक्षता और उत्पादकता में वृद्धि होगी।

जानिए जर्मनी की रेडियन मशीन के बारे में

अधीक्षण अभियंता केके यादव ने बताया कि यह मशीन जर्मनी की प्रसिद्ध हेवी इंडस्ट्रियल कंपनी बाटलीबाई ने ट्रांसमिशन टावर के हैवी एंगल व प्लेट की ड्रिलिंग के लिए डिजाइन की थी। यह साधारण ड्रिलिंग मशीन नहीं, ब्लकि एक यूरोपियन ग्रेड हेवी इंडस्ट्रियल सिस्टम है, जिसमें 60 एमएम तक की स्टील की कटिंग, पंचिंग और नाचिंग तीनों काम एक साथ होता है। यह मशीन भिलाई-03 के वर्कशॉप में रखी थी और लगभग 20 वर्षों से बंद थी। इसे बनाने के लिए निर्माता कंपनी बाटलीबाई कंपनी जर्मनी से संपर्क किया गया। लेकिन जर्मनी वालों ने 60 वर्ष पुरानी तकनीक और स्पेयर पार्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण इसमें रुचि नहीं ली थी। इसलिए मशीन कबाड़ हो रही थी।

 

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