The Stambh Analysis : पहले रूस-यूक्रेन, अब इजरायल-ईरान युद्ध से डीएपी खाद का छत्तीसगढ़-देश में संकट… इसलिए साय सरकार ने उतारा नैनो डीएपी जैसा स्मार्ट विकल्प
छत्तीसगढ़ के किसान डीएपी खाद का संकट झेल रहे हैं, लेकिन यह केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि इस वक्त पूरे देश का बड़ा संकट है। मामला किसानों से जुड़ा है, इसलिए राजनीति भी हो रही है। अहम सवाल ये है कि आख़िर छत्तीसगढ़-देश में डीएपी खाद की इतनी कमी कैसे हो गई? दरअसल दुनिया के कुछ ख़ास इलाक़ों में युद्ध के हालात होंगे तो भारत में डीएपी का स्वाभाविक रूप से भारी संकट खड़ा हो जाएगा। जैसे, रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद 2020 में छत्तीसगढ़ में डीएपी का संकट हुआ था। तत्कालीन सरकारी मशीनरी ने तेज़ी से वैकल्पिक उपाय करके इस संकट को संभाला था। इस बार के डीएपी संकट से निपटने के लिए सीएम विष्णुदेव साय ने किसानों के लिए स्मार्ट विकल्प उतार दिया है। यह है बोतलबंद नैनो डीएपी, जिसे कृषि वैज्ञानिकों ने डीएपी का बहुत अच्छा विकल्प करार दिया है। जहां तक डीएपी की कमी का सवाल है, समंदर में शांति के बाद ही हालात सुधर सकते हैं।
यह जानना बेहद ज़रूरी है कि पूर्व में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध और अब इजरायल-ईरान युद्ध से भारत ही नहीं, बल्कि आधी दुनिया के किसान डीएपी का संकट आख़िर क्यों झेल रहे हैं। जानकारों के मुताबिक भारत को डीएपी यानी डाई-अमोनियम फॉस्फेट का सबसे ज्यादा आयात रूस, जॉर्डन, और इस्राइल से करना पड़ता है। इस वक्त दुनिया में दो बड़े युद्ध चल रहे हैं। पहला रूस और यूक्रेन के बीच और दूसरा इजरायल और ईरान के बीच। रूस और इजरायल जैसे जिन देशों से सबसे ज्यादा डीएपी की सप्लाई होती है, वो अभी युद्ध में हैं। युद्ध से समुद्री मार्ग बुरी तरह प्रभावित है। खासतौर पर इजरायल ईरान युद्ध से लाल सागर पर ज्यादा असर पड़ा है। समुद्री मार्ग में रुकावट का नतीजा है कि जिस डीएपी की खेप को भारत पहुंचने में 21 से 25 दिन लगते थे, उसे अब 50 दिन भी लग रहे हैं और वह भी अनिश्चित है। अब डीएपी की सप्लाई वैकल्पिक मार्ग से भी की जा रही है। इससे करीब 6500 किलोमीटर की दूरी बढ़ गई है।
इसलिए साय सरकार ने नैनो डीएपी का स्टॉक बढ़ाया
छत्तीसगढ़ सरकार ने इस बार डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की कमी को ध्यान में रखते हुए पूरे प्रदेश में नैनो डीएपी के भंडारण एवं वितरण की विशेष व्यवस्था की है। खेती में ठोस डीएपी उर्वरक की कमी को पूरा करने के लिए किसानों को उसके विकल्प के अनुरूप कृषि वैज्ञानिकों के सुझाव के अनुरूप नैनो डीएपी अथवा एनपीके और सिंगल सुपर फास्फेट खाद की मात्रा का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिकों ने नैनो डीएपी का समर्थन करते हुए कहा है कि इसके उपयोग से खेती की लागत में कमी आती है। नैनो डीएपी खेत में पोषण की कमी को प्रभावी ढंग से पूरा करता है और उत्पादन की गुणवत्ता को भी बढ़ाता है। नैनो डीएपी पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है। एक एकड़ धान की फसल के लिए एक बोरी ठोस डीएपी का उपयोग होता है। जिसकी लागत 1350 रूपए होती हैै, जबकि एक एकड़ में 25 किलो ठोस डीएपी और 500 मिली नैनो डीएपी के मिश्रण का उपयोग किया जाए तो इसकी लागत घटकर 1275 रूपए आती है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने एक एकड़ धान की खेती के लिए नैनो डीएपी की उपयोग की विधि की विस्तार से जानकारी दी है। इसके अनुसार नैनो डीएपी की मात्र साढ़े 600 मिली मात्रा एक एकड़ धान की खेती में लगती है। धान की बुआई से पहले एक एकड़ के लिए 30 किलो बीज को 150 मिली नैनो डीएपी को तीन लीटर पानी में घोलकर उसमें बीज उपचारित कर आधा घंटा छाव में सुखाने के बाद बुआई की जाती है। रोपा के समय 50 लीटर पानी में 250 मिली नैनो डीएपी को मिलाकर उसमें थरहा की जड़ों को आधा घंटा डूबाकर रखने के बाद रोपाई तथा फसल बोआई के तीस दिन बाद 125 लीटर पानी में 250 मिली नैनो डीएपी को घोलकर खड़ी फसल पर इसका छिड़काव करना होता है। इससे फसलों को पोषक तत्व मिल जाते है।इसीलिए सीएम विष्णु देव साय के निर्देश के अनुरूप राज्य शासन द्वारा किसानों को डीएपी उर्वरक के विकल्प के रूप में नैनो डीएपी सहित वैकल्पिक उर्वरकों का पर्याप्त भण्डारण समितियों में किया जा रहा है। किसानों को इसके उपयोग के लिए प्रशिक्षण एवं जागरूकता शिविर भी आयोजित किए जा रहे हैं।



